Sunday, February 27, 2011

सुखद नयनों में उदीप्त

Hi, Jeetendra ji,
                          This poem is written especially for my nephew Uttathya Pahwa who i believe is Divine Mother's soul -child.!!!
Hope u will appreciate and 'see' the vision in this poem ? You may put this in your BLOG?
Thanks and Regards,
renu...




प्रस्तुत कविता को उत्तथ्य के जन्मदिवस( २५ जनवरी ) में "साकार देखना" की दिव्य -संकल्प है :--

सुखद नयनों में उदीप्त दिव्य सुनहरी आकृतियों से सुशोभित ( आत्माओं) का अवतरन हुआ !
वो श्वेताम्बर  जैसे चिदाकाश गंगा से उतर भू धरा पे अलंकृत होते  !
वो सूर्या के अलौकिक स्वर्ण तेजस से आवरन दीप की लौ में दमके!
चहुँ ओर वातावरण में मोतियों से बिन्द झरते प्रगट हुए !
मानो सरस्वती के उज्जवल शुभ्र जागृत वृन्द-गान के दीप !
उद्भास्विता के नमोस्तुती आह्वान स्वर -कंठ में सहज आलाप हुए !
उर ह्रदय भावों में बारम्बार गद-गद विशुद्ध श्रुतियों ने जन्म -मन्त्र नाद किया !
उन संगीतमय अव्यक्ति के मृदु-पलों को माताओं ने गोदी में अवलोकन किया!
जैसे वात्सल्य-भाव की कौशल्या और यशोदा की सर्वस्व सृष्टि की आनंदमयता !
सादृश्य आकृतियों  को  दिव्य- मातेश्वरी ने मानो विशेष आभूषित किया हो !
अद्भुत विभूतियों की वृत्त लिए स्वयं विष्णु ने जैसे सहस्त्रों दीपों की आत्मा प्रगट करी !
मन-बुद्धि-ह्रदय-भाव सभी में उस अंतरात्मा की असीम प्रसन्नता विभोर हुई ?
ऐसे अनेकों संकल्पों से  साकार अवतरित दीपों की लौ को जगाये माँ की अनकही ख़ुशी !
उभयतः शुभमस्तु के आशीर्वाद से प्रेरित पितरों के देवों ने शंख -नाद किया होगा !
मंदिरों के पुजारियों ने भी पुष्प-फूलों के सुगंध फैलाएं होंगे !
कभी सीता- राम कभी राधे-  कृष्ण के दिव्य-पूर्वजों के तापस द्वारा दीप- रहस्य भरे होंगे ! 
गुरुओं की इस धरा पे आशीर्वाद भरे आत्मा  -वेदान्त के ज्ञान को प्रतिबिंबित ग्रहण करते दीप !
धन्य हैं वो माताएं और पिताओं की दिव्य अभीप्सा से जागृत उद्बोधित 'धी मही ' के साक्षात वर !
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renuaryamehra

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